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एक हाँथ में कॉफ़ी का मग लिए खिड़की के बाहर मंजूशा मनीप्लांट की बेल को घूरते हुए कुछ सोच ही रही थी तभी उसके मो की घंटी बजी। वो तेजी से फोन की तरफ दौड़ी जैसे कॉफ़ी तो वक़्त काटने का बहाना मात्र था असल में इंतेज़ार तो फोन की इस घंटी का था।
उसने जैसे ही फोन उठाया, दूसरी तरफ आवाज मिसेज प्रेमा शर्मा की थी जो कि एक NGO संचालक हैं। मंजूशा ने अभी हेलो कहा ही था की मिसेज शर्मा ने तेज एवं उत्साहित स्वर में बोला , "हेलो मंजूशा !! तुम्हारी माँ का पता हमें मिल गया है।" ये सुनते ही वो कुछ पल के लिए स्तब्ध रह गयी। मिसेज शर्मा ने बताया की वो अगर चाहे तो कल ही उनसे मिलने के लिए जा सकती है। मंजूशा फोन रख कर वापस खिड़की के पास आकर खड़ी हो गयी। बाहर जितनी शांति थी उसके मन के भीतर उतना ही शोर।
"क्या इतने सालों बाद वापिस उनके पास जाना जिन्होंने मुझे खुद से दूर कर दिया था , सही होगा ?" मंजूशा अपने माँ बाप की गोद ली हुई इकलौती औलाद थी। एक साल की उम्र से उसने उन्हें ही अपने माता पिता के रूप में देखा , मुंबई में ही पढाई लिखाई, शादी और अपने जीवन के 27 साल गुज़ारे। हालांकि ये बात की वो अपने माता पिता की गोद ली हुई संतान है , उसे उसकी किशोरावस्था में ही बता दी गयी थी और इस बात से ना उसके रिश्तों में कोई फ़र्क पड़ा ना उसके जीवन में। यहां तक कि उसने अपने असली माँ बाप के बारे में जानने की कभी कोई इच्छा नहीं जताई।
शादी के २ साल बाद जब डॉक्टर ने खुशखबरी दी की मंजूशा माँ बनने वाली है तो वो और उसका परिवार सभी बहुत खुश थे। हर दिन अपने अंदर एक नन्ही सी जान को बढ़ते हुए महसूस करना उसके लिए बहुत अलग एवं सुखद अनुभव था। अक्सर जब वो अपने बच्चे के बारे में सोच रही होती तो उसे ख्याल आता, "क्या उसकी जन्म देने वाली माँ ने भी यही ख़ुशी , दर्द और इंतज़ार महसूस किया होगा और अगर ऐसा ही था तो उन्होंने मुझे खुद से दूर क्यों किया? आखिर ऐसी भी क्या वजह थी ?
जैसे जैसे दिन गुज़रते जा रहे थे मंजूशा और उसके गर्भ में पल रहे शिशु के बीच का रिश्ता और गहरा होता जा रहा था इसके साथ ही अपनी जन्म दाता माँ के बारे में जानने की उसकी तीव्र इच्छा अब निश्चय में बदल रही थी। "सचिन , मैं अपनी असली माँ से मिलना चाहती हूँ।" एक दिन अचानक ही चाय पीते हुए उसने अपने पति से बोल दिया। चूँकि सचिन एक सुलझा हुआ इंसान है तो बिना ना नकुर किये उसने हामी भर दी।
अब वो दिन आ ही गया था जब वो अपनी माँ से मिलने वाली थी। मिसेज शर्मा ने बताया था की उसकी माँ मुंबई से 550 कि.मी. दूर एक महिला आश्रम ऐसा रहती हैं। वो लोग बड़ी सुबह तैयार हो कर आश्रम के लिये निकल दिये। रास्ते में मिलते हुए खेत, जंगल, जानवर आज मंजूशा को कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। वो बस माथे पर आ रहे पसीने को बार बार पोंछ रही थी। सचिन ने उसके कंधे पर हाँथ रख कर उसे ढांढस बंधाया लेकिन उसके मन की घबराहट और बेचैनी में खासा फ़र्क ना पड़ा।
गाड़ी आश्रम के बाहर आकर रुक गयी, अब वो आश्रम के दरवाजे पर खड़ी थी। उसके कदम आगे बढ़ ही नहीं रहे थे मानो अचानक से पैर भारी हो गए हो। तभी मिसेज शर्मा की आवाज़ ने उसका ध्यान तोड़ा, "चले मंजूशा ।" आश्रम के गलियारे से गुजरते हुए वो लोग बड़े से हॉल में पहुंचे। मिसेज शर्मा ने वहां काम कर रही महिला सहायिका से पूंछा, "शशिलता दुरुशेट्टी कहाँ मिलेंगी ? हम उनसे मिलने हैं।" महिला सहायिका ने किनारे के बेड पर लेती हुयी महिला की तरफ इशारा करते हुए बोला, "वो हैं लेकिन कोई फ़ायदा नहीं उनसे मिलने का, वो सब भूल चुकी हैं किसी को नहीं पहचान पायेंगी।"
भारी कदमों से मंजूशा अपनी माँ की तरफ बढ़ी। उसने करवट लेकर लेती हुई शशिलता के बाजू पर हाँथ रखा। "कौन है ? कौन है ?" शशिलता ने चौंक कर पूँछा। मंजूशा घबराकर दूर हट गयी। तभी मिसेज शर्मा आगे आ कर बोली, "शशिलता जी, हम आपसे मिलने आये हैं आपके पसंदीदा फल और मिठाई भी लाये हैं।" शशिलता अब शांत होकर बारी बारी से सबको देखने लगी कि तभी उसकी निग़ाह मंजूशा पर पड़ी और रुक गयी। उसने मंजूशा को बड़ी हैरानी से एकटक होकर देखा मनो जैसे कि उसे अपना पुराना अक्स उसमे नज़र आ गया हो।
मंजूशा बेड पर आकर बैठ गयी। वह अपनी माँ की बड़ी बड़ी आंखे, चौड़ा माथा और हांथों की लम्बी लम्बी उंगलियां ग़ौर से देख रही थी जो हूबहू उसकी तरह थी। उनके चेहरे पर आयी झुर्रियां ज़िंदगी की वो सारी कहानियां बयां कर रही थी जिनसे वो आज तक अनजान थी। शशिलता ने जैसे ही अपना दायाँ हाँथ आगे बढ़ा कर मंजूशा के सिर पर रखा, मंजूशा की आंख से आंसू का कतरा छलक गया और उसने माँ को गले से लगा लिया। हालाँकि ये सब शशिलता की समझ से परे था लेकिन अपने खून का स्पर्श कहो या अपनेपन की गरमाहट, उसकी आँखों से अश्रु धारा बहने लगी मानो कि उसके अंतःमन ने अपनी बिछड़ी हुई बेटी को पहचान लिया हो।
थोड़ी देर चुपचाप एक दूसरे के पास बैठने के बाद अब वापिस जाने का वक़्त आ गया। मंजूशा जाने के लिए उठने लगी तभी शशिलता ने उसका हाँथ पकड़ लिया और बच्चों की भांति ना जाने की ज़िद करने लगी। मंजूशा ने दोनों हाँथो से माँ के हाँथ को थमते हुए बोला, "मैं फिर जल्दी आऊंगी।" ऐसा कह कर वह आश्रम से बाहर निकली और गाड़ी में जाकर बैठ गयी। गाड़ी ने रफ़्तार पकड़ ली और मंजूशा खिड़की से टिक कर वो सब वाक़या याद करने लगी जो आज हुआ था। उसका मन शांत और चेहरे पर संतोष था। उसे अब इस बात का एहसास था की माँ तो सिर्फ माँ होती है अच्छे बुरे तो हालात होते हैं। उसने गर्व से अपने गर्भ पर हाँथ रखा मानो कि अपने बच्चे से कहना चाह रही हो कि जिस पेड़ के फूल हो तुम, आज मैं उसकी जड़ से मिल कर आयी हूँ।

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