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ए क हाँथ में कॉफ़ी का मग लिए खिड़की के बाहर मंजूशा मनीप्लांट की बेल को घूरते हुए कुछ सोच ही रही थी तभी उसके मो की घंटी बजी। वो तेजी से फोन की तरफ दौड़ी जैसे कॉफ़ी तो वक़्त काटने का बहाना मात्र था असल में इंतेज़ार तो फोन की इस घंटी का था। उसने जैसे ही फोन उठाया, दूसरी तरफ आवाज मिसेज प्रेमा शर्मा की थी जो कि एक NGO संचालक हैं। मंजूशा ने अभी हेलो कहा ही था की मिसेज शर्मा ने तेज एवं उत्साहित स्वर में बोला , "हेलो मंजूशा !! तुम्हारी माँ का पता हमें मिल गया है।" ये सुनते ही वो कुछ पल के लिए स्तब्ध रह गयी। मिसेज शर्मा ने बताया की वो अगर चाहे तो कल ही उनसे मिलने के लिए जा सकती है। मंजूशा फोन रख कर वापस खिड़की के पास आकर खड़ी हो गयी। बाहर जितनी शांति थी उसके मन के भीतर उतना ही शोर। "क्या इतने ...